संदेश

.. धीमे से पास बैठा वो

कहां से इकट्ठा करना होता है, जहां से शुरू हुआ? या जहां का अंदेशा था कि ऐसा भी हो सकता है। ये ऐसा भी हो सकता है वाला अंदेशा बहुत कम यकीन के साथ आता है क्योंकि जब तक आप खुद को मनवा लेते हो कि असल खुशी कम देर ही टिकती है, तो ज्यादा मत सोच। लेकिन जब वो घटित होता है आप यकीन नहीं करते, उसे छूना चाहते हो, उसके उठने, बैठने , सांस लेने, सोने को महसूस करना चाहते हो। संभाल नहीं पाते खुद को.... खोए हुए रहते हो.... मेरा ये दौर खोए हुए रहने वाला ही दौर है। अभी तक ऐसे मसलों से मेरा कोई लेना देना नहीं था, ये अचानक धप्प से मेरे करीब आया है...खूबसूरत है... तो नज़र नहीं लगनी चाहिए। 🧿 वो लड़का कहानियों सा वो लड़की पहली सी.... वो मटर छीलता है और वो छिली मटर खा जाती है वो गुनगुनाता है वो सुनती है ... किताबें खूब महकती हैं फूलों से बातें जरा कम होती हैं उसकी बड़ी आंखे उसे हंसा देती हैं  एक कुंवारी लड़की वाली हंसी  देखी है? वो नजर मिलती है तो हंसना बंद हो जाता है वैसी ही हंसी हंसते हैं दोनों... दोनों सपने में हैं क्या? बताओ बताओ...

खोखला होना, सरल होना है।

गुम होने का दिखावा करना ज्यादा ही जरूरत हो तो ही जवाब देना एक समय के बाद दूर होती जाना, उनसे  जो सिर्फ जताते हैं अपना होना जबकि उन्हें असल में  हर वजह से अपना बनना था उन्हें ख्याल रखना था संभालना था उन्हें भी समझना था जानना था , क्या बुरा लगेगा तुम्हें  कि वो न करें ये काम जबकि बार बार हर बार तुम्हे लांघ कर  उन्होंने ऐसे नजरअंदाज किया तुम्हे जैसे रास्ते में पड़ा कोई पत्थर थीं तुम जैसे कोई फेंका कागज  या फिर कोई बहुत बेखास सी चीज जो भी हो तुम्हे अब बरस कर शांत हो जाना चाहिए।

ईश्वर पराया नहीं है

अब जब विज्ञान ने इतने आविष्कार कर लिए हैं, जिंदगी इतनी जरूरी और आसान बना दी है, ईश्वर एक चिंता में डूब रहा है। कल तक जो मानव उसकी गोद में खेलता था, जो जरूरत मानता था उसे, आज वो उद्दंड नजरों से उसके पूरे संसार को नाश करने पर आमदा है। कहीं भी ईश्वरीय बातें होती हैं तो जरूरत से अधिक अब अकल्पनीय जैसी लगती हैं। लगता है जैसे किसी अजनबी की बातें चल रही हों। जबकि पहले ईश्वर हमें इतना पराया कभी नहीं लगता था। वो पंक्षी, पेड़, पहाड़ों पत्थरों में ईश्वर को मानने वाले हम इतने दूर हो चुके हैं विश्वासों से, जैसे किसी ने देखा ही न हो जन्म से अपने जन्मदाताओं को। विज्ञान ने हमें इतना अविश्वासी बना दिया है कि भूल गए हैं हम आंख बंद करके , दीप जलाकर, मुस्करा कर बैठने पर गहरा आत्मविश्वास जाग सकता है। यही आत्मिक संबंध हमें रूबरू कराता है उस दिव्य चैतन्य से। सब अभ्यास कर रहे हैं रोज गैर बनने का, और कठोर बनने का। सटीकता की तलाश में हम डूब रहे हैं सिर्फ अंधेरे में, जबकि हम जानते हैं कि सटीकता और परम सत्य जैसा कुछ नहीं इस संसार में... उसे देखो  तो गुम है  न देखो तो तिमिर  देख भी लिया तो  विश्व...

सब्र सीखना

सबसे कठिन है सब्र को सीखना  सीखना कैसे प्रेम  कोई पेड़ नहीं एक बीज है,  जिसे दिल की कोमलता से सींचा जा सकता है सीखना कैसे   ईश्वर प्रकट नहीं होते   मांगने और कोरी प्रार्थनाओं से ईश्वर आंख बंद करने से दिखते है  और खुली आंखों से कर्म करने से  हमारे साथ चलते है। सीखना कि धरती मां है मां से स्नेह लिया भी जाता है और उसे लौटाया भी जाता है  हम बेसब्री में  यह भी नहीं देख पाए कि हम कितने स्वार्थी और विश्वासघाती बनते गए हैं ... हम सिर्फ ढोते रहे इंसानी कायदों को  और ये कायदे आज  सिर्फ दूषित सोच को बढ़ावा दे रहे हैं ।

उधेड़बुन

संग कौन ही जाता होगा जाता होगा तो वहां के नियम उन्हें संग रहने देते होंगे? क्या कठोरता सिर्फ पृथ्वी तक सीमित है? क्या ईश्वर और उसकी दुनिया कोमल है? पवित्र? पवित्र कैसे बनते हैं? पवित्रता के क्या मानक हैं? न जाने कौन से अल्हड़ सवाल और बातें मैं सोचती रहती हूं...  कहने को तो पृथ्वी ईश्वर का एक संपूर्ण साम्राज्य है, जहां व्यक्तिवाद को सीमाओं से बांधा तो गया है , लेकिन ये मानकर कि पृथ्वी की भलाई इसी में होगी। उस सत्य की भलाई इसी में होगी जो कथित है। लेकिन जे • एस मिल कहते हैं व्यक्ति जब अपनी उपयोगिताएं समझ लेता है , जब वह अपनी क्षमताओं को पहचान लेता है , उसे स्वायत्तता देनी चाहिए। नियम अगर व्यक्तिवाद का ह्रास करने लगे तो नियमों को बदलने के लिए लड़ना भी चाहिए। साम्राज्यवाद, सामंतवाद, उदारवाद... इसी तरह इंसानी उपयोगिताओं का विकास हुआ है।  पवित्रता के मानक परिष्कृत होते रहे हैं, और आगे भी होंगे। हो सकता है हम और मानवता खोए, हो ये भी  सकता है कुछ ही लोग बचें, जो जीवित रखें शेष मानवता को। लेकिन मानवता के मायने वैसे ही रहेंगे सदैव? क्या कोमलता , मानवता का पर्यायवाची बना रहेगा... पृ...

लकीरें

.... मेरा पता पूछते हुए, जब मेरे दरवाजे पर तुम अचानक से आ जाओगे, मैं वहीं तुम्हें देखकर स्तब्ध जरूर हो जाऊंगी। वहीं बैठ जाऊंगी, तुम्हे देहरी के बाहर ही बैठाऊंगी। तुम्हें यकीन दिलाऊंगी, इतनी दूरियां , इतने लंबे इंतजार फ़िज़ूल हैं हमारे बीच। ये सभी सिर्फ किसी रीत की कच्ची डोर से बंधे थे। जिन्हें हम कभी भी तोड़ सकते थे। सोचो मैं वहां मुंह पर हथेली रखे हुए अपनी मुस्कराहट छिपाते हुए तुमसे पूछूंगी... याद आ गई मैं? तुम मुझे उस अप्रत्यक्ष दीवार का बार बार चित्रण बताओगे, जो हमारे बीच है। तुम बताओगे कैसे जिद और झूठी चकाचौंध रोकती रही हमे। एक लंबे संवाद के बाद तुम्हे बुलाऊंगी। क्योंकि उसी संवाद के बाद मुझे तुम्हारे सामने होने का यकीन होगा। देखना तुम मान जाओगे लकीरें लंबी होती जाती हैं, लेकिन उनकी चौड़ाई उतनी ही रहती है। महीन बहुत महीन....

भाषा मौन की

अंजान आवाजें बारी बारी से मेरा नाम लेती हैं मैं वर्तमान से घबराकर उन्हें अनसुना कर देती हूं मेरा सूरज सुबह भी औंधा सा चित दिखाई देता है सभी का अपना सूरज है सभी के अपने दिन और सभी को अपना चांद  क्योंकि इंसानों का नजरिया अलग है मेरी रात मेरे सिरहाने उन आवाजों को रखती है मैं दूसरी करवट किए सोने का दिखावा करती हूं .... वो आवाजें चूंकि उठ कर हाथ नहीं फेर सकतीं अब  इसलिए मैं गीला मन लेकर ,सिकुड़ कर , शिशु की भांति पड़ी रहती हूं, अपनी नींद की जरूरत में। क्योंकि आखिर में हम जरूरत के हिसाब से आकार ले लेते हैं  जैसे ...मेरी जरूरत एक कोमल स्पर्श है।