संदेश

ईश्वर पराया नहीं है

अब जब विज्ञान ने इतने आविष्कार कर लिए हैं, जिंदगी इतनी जरूरी और आसान बना दी है, ईश्वर एक चिंता में डूब रहा है। कल तक जो मानव उसकी गोद में खेलता था, जो जरूरत मानता था उसे, आज वो उद्दंड नजरों से उसके पूरे संसार को नाश करने पर आमदा है। कहीं भी ईश्वरीय बातें होती हैं तो जरूरत से अधिक अब अकल्पनीय जैसी लगती हैं। लगता है जैसे किसी अजनबी की बातें चल रही हों। जबकि पहले ईश्वर हमें इतना पराया कभी नहीं लगता था। वो पंक्षी, पेड़, पहाड़ों पत्थरों में ईश्वर को मानने वाले हम इतने दूर हो चुके हैं विश्वासों से, जैसे किसी ने देखा ही न हो जन्म से अपने जन्मदाताओं को। विज्ञान ने हमें इतना अविश्वासी बना दिया है कि भूल गए हैं हम आंख बंद करके , दीप जलाकर, मुस्करा कर बैठने पर गहरा आत्मविश्वास जाग सकता है। यही आत्मिक संबंध हमें रूबरू कराता है उस दिव्य चैतन्य से। सब अभ्यास कर रहे हैं रोज गैर बनने का, और कठोर बनने का। सटीकता की तलाश में हम डूब रहे हैं सिर्फ अंधेरे में, जबकि हम जानते हैं कि सटीकता और परम सत्य जैसा कुछ नहीं इस संसार में... उसे देखो  तो गुम है  न देखो तो तिमिर  देख भी लिया तो  विश्व...

सब्र सीखना

सबसे कठिन है सब्र को सीखना  सीखना कैसे प्रेम  कोई पेड़ नहीं एक बीज है,  जिसे दिल की कोमलता से सींचा जा सकता है सीखना कैसे   ईश्वर प्रकट नहीं होते   मांगने और कोरी प्रार्थनाओं से ईश्वर आंख बंद करने से दिखते है  और खुली आंखों से कर्म करने से  हमारे साथ चलते है। सीखना कि धरती मां है मां से स्नेह लिया भी जाता है और उसे लौटाया भी जाता है  हम बेसब्री में  यह भी नहीं देख पाए कि हम कितने स्वार्थी और विश्वासघाती बनते गए हैं ... हम सिर्फ ढोते रहे इंसानी कायदों को  और ये कायदे आज  सिर्फ दूषित सोच को बढ़ावा दे रहे हैं ।

उधेड़बुन

संग कौन ही जाता होगा जाता होगा तो वहां के नियम उन्हें संग रहने देते होंगे? क्या कठोरता सिर्फ पृथ्वी तक सीमित है? क्या ईश्वर और उसकी दुनिया कोमल है? पवित्र? पवित्र कैसे बनते हैं? पवित्रता के क्या मानक हैं? न जाने कौन से अल्हड़ सवाल और बातें मैं सोचती रहती हूं...  कहने को तो पृथ्वी ईश्वर का एक संपूर्ण साम्राज्य है, जहां व्यक्तिवाद को सीमाओं से बांधा तो गया है , लेकिन ये मानकर कि पृथ्वी की भलाई इसी में होगी। उस सत्य की भलाई इसी में होगी जो कथित है। लेकिन जे • एस मिल कहते हैं व्यक्ति जब अपनी उपयोगिताएं समझ लेता है , जब वह अपनी क्षमताओं को पहचान लेता है , उसे स्वायत्तता देनी चाहिए। नियम अगर व्यक्तिवाद का ह्रास करने लगे तो नियमों को बदलने के लिए लड़ना भी चाहिए। साम्राज्यवाद, सामंतवाद, उदारवाद... इसी तरह इंसानी उपयोगिताओं का विकास हुआ है।  पवित्रता के मानक परिष्कृत होते रहे हैं, और आगे भी होंगे। हो सकता है हम और मानवता खोए, हो ये भी  सकता है कुछ ही लोग बचें, जो जीवित रखें शेष मानवता को। लेकिन मानवता के मायने वैसे ही रहेंगे सदैव? क्या कोमलता , मानवता का पर्यायवाची बना रहेगा... पृ...

लकीरें

.... मेरा पता पूछते हुए, जब मेरे दरवाजे पर तुम अचानक से आ जाओगे, मैं वहीं तुम्हें देखकर स्तब्ध जरूर हो जाऊंगी। वहीं बैठ जाऊंगी, तुम्हे देहरी के बाहर ही बैठाऊंगी। तुम्हें यकीन दिलाऊंगी, इतनी दूरियां , इतने लंबे इंतजार फ़िज़ूल हैं हमारे बीच। ये सभी सिर्फ किसी रीत की कच्ची डोर से बंधे थे। जिन्हें हम कभी भी तोड़ सकते थे। सोचो मैं वहां मुंह पर हथेली रखे हुए अपनी मुस्कराहट छिपाते हुए तुमसे पूछूंगी... याद आ गई मैं? तुम मुझे उस अप्रत्यक्ष दीवार का बार बार चित्रण बताओगे, जो हमारे बीच है। तुम बताओगे कैसे जिद और झूठी चकाचौंध रोकती रही हमे। एक लंबे संवाद के बाद तुम्हे बुलाऊंगी। क्योंकि उसी संवाद के बाद मुझे तुम्हारे सामने होने का यकीन होगा। देखना तुम मान जाओगे लकीरें लंबी होती जाती हैं, लेकिन उनकी चौड़ाई उतनी ही रहती है। महीन बहुत महीन....

भाषा मौन की

अंजान आवाजें बारी बारी से मेरा नाम लेती हैं मैं वर्तमान से घबराकर उन्हें अनसुना कर देती हूं मेरा सूरज सुबह भी औंधा सा चित दिखाई देता है सभी का अपना सूरज है सभी के अपने दिन और सभी को अपना चांद  क्योंकि इंसानों का नजरिया अलग है मेरी रात मेरे सिरहाने उन आवाजों को रखती है मैं दूसरी करवट किए सोने का दिखावा करती हूं .... वो आवाजें चूंकि उठ कर हाथ नहीं फेर सकतीं अब  इसलिए मैं गीला मन लेकर ,सिकुड़ कर , शिशु की भांति पड़ी रहती हूं, अपनी नींद की जरूरत में। क्योंकि आखिर में हम जरूरत के हिसाब से आकार ले लेते हैं  जैसे ...मेरी जरूरत एक कोमल स्पर्श है।

तब्दीली

बार बार डरती हूं, लेखक बनने से। चारों तरफ एकांत, दुख, सुख की इच्छा, सही समय की तलाश , सुकून की तलाश, प्रेम, विरह खाली मन...ये सब ही ऐसे चारों तरफ मुख्य विषय की तरह उभर उभर कर सामने आ रहे हैं। मनःस्थिति को कागज या स्क्रीन पर उतार कर मुझे हल्कापन तो महसूस होता है, लेकिन डर भी छिपा रहता है, कि कहीं मैं इन सब की तरह,  और गहरा सोचने लगी तोक्या होगा मेरा। मेरे आसपास तो न तो फूल हैं, न कोमल हाथ, न ही मजबूत कंधे.. लेकिन ऐसा हुआ तो इसकी जिम्मेदारी मैं नहीं ले पाऊंगी।  लेखक होना गैर जिम्मेदार होना है। लोग आपको हौंसला नहीं, आपको बिना समझे झाड़ पर चढ़ा देते हैं। ये जानते हुए कि तना कमजोर है । मुझे मालूम है अगर गिरी तो वो बिल्कुल जिम्मेदारी नहीं लेगे।  क्या हुआ है भारतीय लेखन को, अब हर जगह भूख दिखती है, प्रेम, विरह, सुकून, सुख की। लोग प्रेम को लिखकर महसूस कर रहे हैं। ये ऐसा शायद दिखावा कर रहे हैं, या तसल्ली दे रह हैं खुद को , या की ऐसा भी हो सकता है वो किसी कल्पना लोक में जीने की कोशिश में लगे हैं। सब भाग रहे हैं खुद से, शायद मैं भी उसी रेस की तैयारी में लग गई हूं....लेकिन ये होना मेर...

.... सब छोड़ आना

1.तुम आओ मेरे पास, सभी बाहरी लड़ाइयां लड़कर.. समाज से, रिश्तेदारों से, मन के फीके पड़े अपनों से। तुम मेरे पास आओ और छिप जाओ मेरे आंचल में, मैं समेटना चाहती हूं तुम्हारे रिसते हर दर्द को, और तुम्हे दिखाना चाहती हूं कि तुम सबसे सुरक्षित बाहों में हो।  2.मुझे देखने दो, तुम्हें रोता हुआ देखकर मुझे याद आता है नरम दिल का वो लड़का जो मां के जाने के बाद सब सहता है ये सोचकर कि कोई संभालने वाला नहीं । यकीन मानो मैं किसी से नहीं कहूंगी, तुम आओ मेरे पास... 3.तुम इंतजार करना छोड़ दोगे क्या? कि इस दुनिया की ज़हालत भरी मजबूरियां जब छूटेगी तब तुम मेरे पास आओगे? सुनो रहने दो, मत करो इंतजार, लगा लेने दो जोर इन मजबूरियों को , देखना एक देर रात के बाद तुम मुस्कुराओगे और भोर के सूरज में तुम चमकीली आंखों के साथ मेरा हाथ थामोगे और साथ चल दोगे... 4.तुम क्या ढूंढ रहे हो इतनी देर? कहीं तुम मेरे लिए तोहफे इकट्ठे तो नहीं कर रहे? सुनो... दूसरे के लिए तोहफे इकट्ठे करना, और मैं दूसरी नहीं हूं, मैं एक तुमसे जुड़ा दशमलव हूं....    5. तुम महीनों नहीं आते, और मैं इंतजार भी नहीं करती। क्यूंकि घर को इंतजार न...