लकीरें
.... मेरा पता पूछते हुए, जब मेरे दरवाजे पर तुम अचानक से आ जाओगे, मैं वहीं तुम्हें देखकर स्तब्ध जरूर हो जाऊंगी। वहीं बैठ जाऊंगी, तुम्हे देहरी के बाहर ही बैठाऊंगी। तुम्हें यकीन दिलाऊंगी, इतनी दूरियां , इतने लंबे इंतजार फ़िज़ूल हैं हमारे बीच। ये सभी सिर्फ किसी रीत की कच्ची डोर से बंधे थे। जिन्हें हम कभी भी तोड़ सकते थे। सोचो मैं वहां मुंह पर हथेली रखे हुए अपनी मुस्कराहट छिपाते हुए तुमसे पूछूंगी... याद आ गई मैं? तुम मुझे उस अप्रत्यक्ष दीवार का बार बार चित्रण बताओगे, जो हमारे बीच है। तुम बताओगे कैसे जिद और झूठी चकाचौंध रोकती रही हमे। एक लंबे संवाद के बाद तुम्हे बुलाऊंगी। क्योंकि उसी संवाद के बाद मुझे तुम्हारे सामने होने का यकीन होगा। देखना तुम मान जाओगे लकीरें लंबी होती जाती हैं, लेकिन उनकी चौड़ाई उतनी ही रहती है। महीन बहुत महीन....