दुख अनाथ नहीं है

 कहीं कोई बहुत दर्द मिल जाए पढ़ने को, इतना जी कौंध रहा है अंदर से, यूं लग रहा है अगर नहीं पढ़ा निर्मल वर्मा जैसा किसी को तो शायद नहीं जिऊंगी मैं, रेंगती फिरूंगी। एक भूली हुई चींटी की तरह... 

कभी कभी भीतर के दुख को बहाने देकर बहलाने के लिए पढ़ने पड़ते हैं समान एहसास ..

ये याद दिलाने के लिए कि दुख बीत रहा है किसी और के साथ भी...बहुत ही ज्यादा चिड़चिड़ी बन जाती हूं, अधूरी सी, उस वक्त मानो बहुत कुछ हरकत कर रहा है भीतर। एक लम्हा है जो नहीं चाहता बीतना, चाहता है ठहरा रहे... लेकिन उसके बीत जाने के लिए मुझे पढ़ना पड़ता है किसी दूसरे दुख को।

और ऐसा मेरी आदत बन चुकी है अब, मानो ये दुनिया मेरे भीतर जो गुजर रही है, इसके लिए ईंधन है एक जरूरी यह सब। अगर सही पंक्तियां नहीं मिलीं तो मृत्यु होगी एहसासों की , मजबूरी में... और तुम जानते हो मजबूरी में मरना आत्महत्या होती है क्योंकि मैं नहीं चाहती खुद को खोना इसलिए बार बार याद दिलाती रहती हूं इस एहसास को.. कि और भी हैं जिन पर दुख बीत रहा है...

इसलिए भी मैं चाहती हूं उन सभी को पढ़ना जरूरी है जो नहीं जानते दुःख अनाथ नहीं है...

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