... समय के साथ बहना।

 निर्मल वर्मा लिखते हैं.. कि देखते हुए जो हम भूल जाते हैं, लिखते हुए वो फिर याद आ जाता है। लेकिन याद करना ...देखना नहीं है..वह अलग करना है

अलग करना... किससे?

किसी ऐसे शख्स से जो समझ पाए वास्तविक जीवन और अवास्तविक सौन्दर्य में फर्क। हमारे सभी के भीतर एक ऐसा अंश है जो बहुत सी बातों, कहानियों में वास्तविक टुकड़ा ढूंढ कर अपने पास रख लेता है। जैसे मैने बहुत सालों से रख रखा है.. एक ऐसा जीवन जो निरा अकेला होगा, जहां मेरी तकलीफें रोज मेरे साथ सोएंगी वहां कोई नहीं पूछेगा  कि कैसी हो ईशा..

मै समझती हूं ऐसा नहीं होगा, ज्यादा दिनों तक इंसान नहीं रह पाता अकेला, असलियत में सभी घिरे रहते हैं, भले ही जिंदा लोगों से नहीं, लेकिन गुजरे की याद से तो जरूर। ..सभी के सुख बहुत धुंधले हैं, दुख अपारदर्शी है। लेकिन लगता उलट है, हम दुःख को देखकर आंख मूंद लेते हैं, और सुख न होने पर भी उसे सोच लेते हैं। 

बहुत अनंत तक नहीं जाना चाहती हूं मैं अपने विचारों में , लेकिन ये बार बार हो जाता है। मानो मैं ही खुद को एक भूल भुलैया में छोड़ आती हूं , और जो वहां है वो एक अलग कर दी गई ईशा का एक अंश है। बाहर जो किनारे पर है, उसमें आत्मीयता है ही नहीं, वह सूखे स्वर में बह रही है...समय के साथ।

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