सच सिर्फ रुलाते हैं..

... लिखना , गहन विचारों पर कार्य करने का परिणाम है। वे विचार जो समाज, परिवार, विश्व, प्रकृति, और यहां के निवासियों को सोचने के बाद आकार लेते हैं। और जब सोचना आरम्भ होता है तो एक बंजर मैदान पर मेहनत से एक पौधा उगाना होता है, जिसे हम विचार कह सकते हैं। 
मुझे लगता है, जो लिखता है वो खुश नहीं रहना चाहिए, क्योंकि इस दुनिया में तमाम ऐसी सच्चाई हैं जो तुम्हे इतना दुखी कर सकती हैं कि तुम विवश हो जाओ रोने के लिए...। सच का साथी सुख नहीं, कभी नहीं...सच का कोई साथी नहीं होता। वो नितांत अकेले , निर्भय होकर रह सकता है। इंसान ने परंपराएं गढ़ीं, संस्कृति बनाई..एक सामाजिक जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए। जिससे समाज सभ्य बना रहे, कलह न हो। लेकिन भूल गए हम की इन्हीं परंपराओं ने कई ऐसे सच को झूठ की मिट्टी से दबा दिया जिससे मानव जीवन ख़ुशपूर्वक बीते। 
मुझ पर ये सब पढ़ने का और सोचने का असर है। कई लोग बरसो से मुझसे कहते हैं, तुम खुश रहा करो। मैं खुश नहीं रह सकती, लेकिन हां, नाउम्मीदी नहीं है मेरे भीतर। मुझमें भी दिलचस्पी है, लेकिन वो खुश रहने से ज्यादा नया पढ़ने, सीखने और लिखने की दिलचस्पी...


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