संदेश

" दिखावा "

 रिश्तेदार,समाज, अपनों के बीच सही बात करना और असल सही बात में बहुत ज्यादा फर्क होता है। ये किसी को खुश करना और खुद के प्रति वफादार बने रहने के बीच का फर्क है।  पूरी जिंदगी इंसान इसी भागदौड़ में लगा रहता है कि कैसे भी गलत करके भी या चुप रहकर भी वो सही बना रहे उनके लिए जो महज नाम भर के लिए उसके अपने होने का दावा करते हैं। लेकिन कभी तो लगता होगा कि साला गलती की दूसरों को खुश करते करते , इतने efforts कभी खुद के लिए लगा लिए होते तो हम खुश होते। इस समय जिस iitan baba की जय जयकार पूरा भारत लगा रहा है वो पूरी तरह समाज , रिश्तेदारों से दूर निकला हुआ व्यक्ति है। "हमारा धर्म है हम बने रहना" यानि मनुष्य का धर्म मनुष्य बने रहना, जानवर का धर्म जानवर बने रहना... ये लाइन महज एक लाइन नहीं है। जब मैं उन्हें सुनी (हालांकि मैं ज्यादा नहीं सुनी) तो यही लाइन मुझे सबसे आकर्षित की( उनकी ओर नहीं उनके व्यक्तित्व की ओर) .... आज मनुष्य मनुष्य कम खिलौना बना हुआ है। जिसका धर्म हर सामने वाले व्यक्ति को खुश करना है। हां हर कोई नहीं भाग सकता इन झूठ से , या इन अंधे रिश्तों से... हर कोई बाबा नहीं बन सकता, लेकि...

उद्धरण

1. तुम्हें क़रीब रखने के लिए  प्यार से अधिक जरूरतें ज़्यादा काम आएंगी, इससे तुम अपने अहम होने का अंदाज़ कर सकते हो। ... उस अंदाज़ में कम से कम तुम ये भी समझ पाओगे तुम्हें काम में लिया जा रहा है। 2. कौवा सफेद नहीं होता, उसी तरह जो तुम्हारे लिए गलत फहमी रखते हैं तुम उनके बदलने की उम्मीद मत करो। 3. हमारी चेतना हमसे कहीं अधिक उम्मीद रखती है, उसे पहचानना जरूरी है। 4. मैंने कई दिल देखे सब रंगीन थे, पर ना कोई काला था जिसमें अंधेरा हो और मैं खो जाऊं  ना ही कोई सफेद जो बताता मुझे कि मैं कितनी खास हूं। 5. उनके जाने के बाद मैने सपनों के दायरे सीमित कर दिए हैं , क्योंकि मुझे हर दिन खयाल आ ही जाता है कि सब यहीं रह जाएगा। 6. उन्हीं लोगों से जुड़ो जिनसे तुम्हारा अंतर्मन जुड़ने की इच्छा करे, तुम किसी के घर का पालतू कुत्ता नहीं हो कि तुम्हे सभी को सूंघना है और सभी को जानना है।

... अंतर

नारीवाद को सम्मान देती हुई मेरी सोच, आज के नारीवाद के विचार से बिल्कुल अलग है। आज का नारीवाद पुरुषों के जैसा जीवन चाहता है। स्त्री और पुरुष के बीच जो जैविक अन्तर है उसे मिटाकर कुछ ऐसा साबित करना चाहता है पुरुषत्व के बीज भी हम धारण कर लें...  वर्तमान विश्व में स्त्री समान अधिकार की मांग करती है, लेकिन ...सामान अधिकारों से अधिक इस बात पर सोचना चाहिए कि हम जैविक अन्तर नहीं मिटा सकते। ये स्त्रीत्व को धुंधला कर देगा एक दिन, हम स्त्रियां भूल जाएंगी कि आसमां के सृजनकर्ता ने उसी जैसा धरती पर भेजा है जो सृजन करने की क्षमता रखती है। बराबरी और मान्य ( या वाजिब) के बीच महीन अंतर है, जो नारीवाद नहीं जगह दे रहा अपने बीच।  मेरे विचार मेरे व्यक्तिगत हैं... मैं अपनी हर आयु के विकास में नारीवाद पर अलग अलग विचार रखती आई हूं। कुछ वर्ष पूर्व मैं कट्टरता से बराबरी होने से सहमत थी। पर अब नहीं हूं... अब मुझे प्रकृति और स्त्री में महीन, कोमल संबंध दिखता है। एक ममत्व पलता है बचपन से स्त्री के भीतर, जो किसी भी कमजोर, अशक्त व्यक्ति को देखकर अपने आप उभर आता है। बहुत ज्यादा मै प्रकृति से जुड़ने पर विश्वास ...

... अंत एक परिणाम है, जो कभी नहीं घटता

 .. अभी अभी एक किताब खत्म करके लौटी हूं, काफी दिनों से कुछ नहीं लिखा ये ऐसा था जैसे किसी काम में व्यस्त होकर,अपने किसी जिद्दी बालक को मां सुला देती है। और व्यस्त रखती है खुद को उस जरूरी काम में... अब अचानक बड़बड़ाने लगती हूं, कुछ प्रार्थनाएं किससे करती हूं नहीं पता, सिर्फ इतना मालूम है..इन्हें कहने के बाद मुझे एक सिरहाना मिल जाता है, जिसके पास बैठकर मैं कुछ भी कह सकती हूं। ईश्वर से मेरा जुड़ाव कभी उस तरह नहीं होता जैसा मेरे आसपास के लोगों को होता है, जैसे वे ईश्वर को अपना पूरा आत्मविश्वास थमा देते हों और बदले में ईश्वर उनके सभी काम पूरे करने की जिम्मेदारी लेता है। मानो वह कोई बलशाली राजा है या कोई तानाशाह, जिसकी अपनी मार्जियों से यह दुनिया चलती है। ....पता नहीं क्यों मैने बचपन में जिस ईश्वर को माना था वो मेरा मित्र था, मेरा कोई सगा.. ऐसी बात नहीं है कि मैने स्वयं को नास्तिक मान लिया है। नास्तिक होना अहंकार वादी होना है। मुझमें आत्मविश्वास है, अहंकार नहीं... ये सुख दुख की बातें ही हैं जो दुनिया में जीवन को चला रही हैं।  बताओ तुमने कभी सुख की शक्ल देखी है? यह भोला होता है, बहुत ...

सच सिर्फ रुलाते हैं..

... लिखना , गहन विचारों पर कार्य करने का परिणाम है। वे विचार जो समाज, परिवार, विश्व, प्रकृति, और यहां के निवासियों को सोचने के बाद आकार लेते हैं। और जब सोचना आरम्भ होता है तो एक बंजर मैदान पर मेहनत से एक पौधा उगाना होता है, जिसे हम विचार कह सकते हैं।  मुझे लगता है, जो लिखता है वो खुश नहीं रहना चाहिए, क्योंकि इस दुनिया में तमाम ऐसी सच्चाई हैं जो तुम्हे इतना दुखी कर सकती हैं कि तुम विवश हो जाओ रोने के लिए...। सच का साथी सुख नहीं, कभी नहीं...सच का कोई साथी नहीं होता। वो नितांत अकेले , निर्भय होकर रह सकता है। इंसान ने परंपराएं गढ़ीं, संस्कृति बनाई..एक सामाजिक जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए। जिससे समाज सभ्य बना रहे, कलह न हो। लेकिन भूल गए हम की इन्हीं परंपराओं ने कई ऐसे सच को झूठ की मिट्टी से दबा दिया जिससे मानव जीवन ख़ुशपूर्वक बीते।  मुझ पर ये सब पढ़ने का और सोचने का असर है। कई लोग बरसो से मुझसे कहते हैं, तुम खुश रहा करो। मैं खुश नहीं रह सकती, लेकिन हां, नाउम्मीदी नहीं है मेरे भीतर। मुझमें भी दिलचस्पी है, लेकिन वो खुश रहने से ज्यादा नया पढ़ने, सीखने और लिखने की दिलचस्पी...

... समय के साथ बहना।

 निर्मल वर्मा लिखते हैं.. कि देखते हुए जो हम भूल जाते हैं, लिखते हुए वो फिर याद आ जाता है। लेकिन याद करना ...देखना नहीं है..वह अलग करना है अलग करना... किससे? किसी ऐसे शख्स से जो समझ पाए वास्तविक जीवन और अवास्तविक सौन्दर्य में फर्क। हमारे सभी के भीतर एक ऐसा अंश है जो बहुत सी बातों, कहानियों में वास्तविक टुकड़ा ढूंढ कर अपने पास रख लेता है। जैसे मैने बहुत सालों से रख रखा है.. एक ऐसा जीवन जो निरा अकेला होगा, जहां मेरी तकलीफें रोज मेरे साथ सोएंगी वहां कोई नहीं पूछेगा  कि कैसी हो ईशा.. मै समझती हूं ऐसा नहीं होगा, ज्यादा दिनों तक इंसान नहीं रह पाता अकेला, असलियत में सभी घिरे रहते हैं, भले ही जिंदा लोगों से नहीं, लेकिन गुजरे की याद से तो जरूर। ..सभी के सुख बहुत धुंधले हैं, दुख अपारदर्शी है। लेकिन लगता उलट है, हम दुःख को देखकर आंख मूंद लेते हैं, और सुख न होने पर भी उसे सोच लेते हैं।  बहुत अनंत तक नहीं जाना चाहती हूं मैं अपने विचारों में , लेकिन ये बार बार हो जाता है। मानो मैं ही खुद को एक भूल भुलैया में छोड़ आती हूं , और जो वहां है वो एक अलग कर दी गई ईशा का एक अंश है। बाहर जो किना...

दुख अनाथ नहीं है

 कहीं कोई बहुत दर्द मिल जाए पढ़ने को, इतना जी कौंध रहा है अंदर से, यूं लग रहा है अगर नहीं पढ़ा निर्मल वर्मा जैसा किसी को तो शायद नहीं जिऊंगी मैं, रेंगती फिरूंगी। एक भूली हुई चींटी की तरह...  कभी कभी भीतर के दुख को बहाने देकर बहलाने के लिए पढ़ने पड़ते हैं समान एहसास .. ये याद दिलाने के लिए कि दुख बीत रहा है किसी और के साथ भी...बहुत ही ज्यादा चिड़चिड़ी बन जाती हूं, अधूरी सी, उस वक्त मानो बहुत कुछ हरकत कर रहा है भीतर। एक लम्हा है जो नहीं चाहता बीतना, चाहता है ठहरा रहे... लेकिन उसके बीत जाने के लिए मुझे पढ़ना पड़ता है किसी दूसरे दुख को। और ऐसा मेरी आदत बन चुकी है अब, मानो ये दुनिया मेरे भीतर जो गुजर रही है, इसके लिए ईंधन है एक जरूरी यह सब। अगर सही पंक्तियां नहीं मिलीं तो मृत्यु होगी एहसासों की , मजबूरी में... और तुम जानते हो मजबूरी में मरना आत्महत्या होती है क्योंकि मैं नहीं चाहती खुद को खोना इसलिए बार बार याद दिलाती रहती हूं इस एहसास को.. कि और भी हैं जिन पर दुख बीत रहा है... इसलिए भी मैं चाहती हूं उन सभी को पढ़ना जरूरी है जो नहीं जानते दुःख अनाथ नहीं है...